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क्या है मरुस्थलीकरण, जो झारखंड की ज़मीन को खा रहा है!

दूषित जल, वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अब इन कठिन शब्दों की डिक्शनरी में एक और शब्द जुड़ चुका है और वो है मरुस्थलीकरण। PIC-downtoearth.org.in

मरुस्थलीकरण का कठिन शब्दों में मतलब है- एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें शुष्कभूमि अपनी उत्पादकता खो देती है, आसान भाषा में इसे समझा जाए तो इसका अर्थ वो ज़मीन जो अब उपजाऊं नहीं रही या जिस पर अब खेती नहीं की जा सकती हो और आसान भाषा में समझे तो रेगिस्तान का ज़मीन को अपने कब्ज़े में लेना यानी ज़मीन का रेगिस्तानीकरण।

जलवायु परिवर्तन की तरह मरुस्थलीकरण भी अब वैशविक समस्या बनती जा रही है, जिसके मद्देनज़र भारत में कॉप14- कॉन्फ्रेंस ऑफ पारटीज़ का आयोजन हुआ। यह संयुक्त राष्ट्र के द्वारा आयोजित एक प्रकार का वैशविक अधिवेशन है जिसमें मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए भारत में बैठक हुई।

भारत को हिस्सा मरुस्थलीकरण की चपेट में तेजी से आ रहा है जिसका असर कृषि पर निर्भर लोगों पर पड़ रहा है।

‘डाउन टू अर्थ’ के अनुसार झारखंड सबसे ज़्यादा मरुस्थलीकरण की चपेट में है। वहां की भौगोलिक स्थिति सपाट यानी प्लेन नहीं है वह टेढ़ी-मेढ़ी है जिससे की मिट्टी का कटाव बहुत ज़्यादा है। ऐसी भौगोलिक स्थिति और बारिश आधारित कृषि- कम उत्पादकता का सबसे बड़ा कारण है। झारखंड राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और गोवा के अलावा उन पाँच राज्यों में एक है, जहां कुल भौगोलिक क्षेत्र का 50 फीसदी हिस्सा बंजर और भू-क्षरण के अंतर्गत आता है। राज्य के गिरिडीह जिले की बात करें तो यह सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है जो अति चिंताजनक है। गिरिडीह जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 70 फीसदी से ज़्यादा हिस्सा भू-क्षरण की चपेट में है यह वही हिस्सा है जहां देश में सबसे ज़्यादा कोयला खदान के पट्टे है।

दरअसल खनन भी मरुस्थलीकरण का एक सबसे बड़ा कारण है  और झारखंड में खनन बड़े स्तर पर हो रहा है वही अवैध खनन भी एक बड़ी समस्या है।

आखिर भारत अब किस-किस से लड़े, जल संकट से, प्रदूषण से, जलवायु परिवर्तन से या मरुस्थलीकरण से हांलाकि हमारी सरकार अभी तो कभी पाकिस्तान से लड़ने में व्यस्त रहती है कभी स्व. नेहरू जी से।  

नोट: यह लेख IIMC के छात्र PRATIK WAGHMARE द्वारा लिखा गया है।

Jharkhand LIVE Staff

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