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जन्मदिन विशेष: कौन थे बिरसा मुंडा जिन्हें आदिवासी समाज आज भी भगवान की तरह मानता है?

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले महान क्रांतिकारी नेता बिरसा मुंडा की आज 144 वीं जयंती है। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 में राँची के उलीहातू गाँव में हुआ था। बिरसा मुंडा का ताल्लुक आदिवासी समाज से था। मुंडा के पिता का नाम करमी हातू और माता का नाम सुगना मुंडा था। मुंडा की प्रारम्भिक पढाई साल्गा गाँव में हुई। इसके बाद मुंडा आगे की पढ़ाई के लिए चाईबासा के जर्मन मिशनरी स्कूल आ गए।

जर्मन मिशनरी स्कूल ईसाई स्कूल था और उस वक्त किसी भी ईसाई स्कूल में दाखिला लेने के लिए ईसाई होना जरूरी था, इसलिए मुंडा को भी ईसाई धर्म अपनाना पड़ा। इसके कुछ वक्त बाद ही सरदार आंदोलन शुरू हो गया और मुंडा ने ईसाई धर्म छोड़कर अपने समाज के लिए काम करना शुरू कर दिया। हालांकि ईसाई धर्म छोड़ने के बाद वे हिंदू धर्म के प्रभाव में भी आए थे लेकिन अंत में उन्होंने आदिवासियों के आदि धर्म को बढ़ावा दिया।

वहीं दूसरी ओर ईसाई धर्म का आदिवासी समाज पर भी प्रभाव बढ़ रहा था। अंग्रेज भी आदिवासी समाज पर अत्याचार कर रहे थे। इसके बाद मुंडा ने इन अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की और अपने समाज का नेतृत्व किया। बिरसा मुंडा ने सबसे पहले अपने समाज में फैले अंधविश्वास को दूर करने के लिए और आदिवासियों का धर्म परिवर्तन रोकने के लिए अपने समाज के लोगों से किसी भी तरह के बाहरी धर्म की जगह अपने पारंपरिक देवी-देवताओं की पूजा करने को कहा। मुंडा की बातों का असर समाज पर होने लगा और ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और आदिवासी ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे।

बिरसा मुंडा ने इस दौरान समाज पर हो रहे अत्याचार और किसानों के हो रहे शोषण करने वाले जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी लोगों को दी। इसके बाद बिरसा मुंडा ने 1 अक्टूबर 1894 को सभी मुंडाओं को एकत्र कर अंग्रेजों से लगान माफी के लिए आंदोलन शुरू किया। 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग केंद्रीय कारागार में दो साल तक जेल में रखा गया। लेकिन इस दौरान भी बिरसा के अनुयायियों ने उनके आंदोलन को जीवित रखा। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ा कि वे कोई प्रचार नहीं करेंगे, परन्तु बिरसा कहाँ मानने वाले थे। छूटने के बाद उन्होंने अपने अनुयायियों के दो दल बनाए। एक दल मुंडा धर्म का प्रचार करने लगा और दूसरा राजनीतिक कार्य करने लगा। नए युवक भी भर्ती किये गए। इस पर सरकार ने फिर उनकी गिरफ्तारी का वारंट निकाला, किन्तु बिरसा मुंडा पकड़ में नहीं आये।

1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे। इस दौरान बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला।1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गई लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारियां हुई।

बिरसा ने साफ-साफ अंग्रेजों से कहा कि छोटानागपुर पर आदिवासियों का हक है। बिरसा ने नारा दिया कि ‘महारानी राज तुंदु जाना ओरो अबुआ राज एते जाना’ अर्थात ‘(ब्रिटिश) महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो।’ इस हक की लड़ाई के लिए अंत में 24 दिसंबर 1899 को बिरसा के अनुयायियों ने अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ा। 5 जनवरी 1900 तक पूरे छोटानागपुर में विद्रोह की चिंगारियां फैल गई। ब्रिटिश फौज ने आंदोलन का दमन करना शुरू कर दिया।

9 जनवरी 1900 के ऐतिहासिक दिन डोमबाड़ी पहा‍ड़ी पर अंग्रेजों से लड़ते हुए सैकड़ों मुंडाओं ने शहादत दी। बिरसा मुंडा काफी समय तक तो अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आए, लेकिन एक स्थानीय गद्दार की वजह से 3 मार्च 1900 को गिरफ्तार हो गए। 9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा मुंडा का निधन हो गया। इस दिन को बिरसा शहादत दिवस के नाम से याद किया जाता हैं। अंग्रेजों के खिलाफ बिरसा का संघर्ष 6 वर्षों से अधिक चला। भले ही बिरसा का निधन हो गया था लेकिन बिरसा के ‘उलगुलान’ से ब्रिटिश सरकार इतनी डर गई थी कि उसने मजबूर होकर आदिवासियों के हक की रक्षा करने वाला छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट पारित कर दिया।

बिरसा ने अपने जीवन के 25 सालों में ही एक कांतिकारी नेता की पहचान बना ली थी। उन्होंने अपने समाज के साथ भारतीय संस्कृती की भी रक्षा कि और अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी। बिरसा के इसी योगदान की वजह से आदिवासी समाज उन्हें भगवान की तरह याद करते है और उन्हें धरती आबा’ यानी धरती का पिता की रूप में याद करते है। बिरसा इकलौते ऐसे आदिवासी नेता हैं जिनका चित्र भारतीय संसद में लगा हुआ है।

Jharkhand LIVE Staff

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