झारखंड हाईकोर्ट ने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी न केवल न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि गवाहों की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर भी प्रतिकूल असर डालती है। इसी को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से उसके पास लंबित 11 मामलों की अद्यतन स्थिति रिपोर्ट तलब की है।
यह आदेश जस्टिस आर. मुखोपाध्याय और जस्टिस पी.के. श्रीवास्तव की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान से दर्ज मामले की सुनवाई के दौरान पारित किया। अदालत ने सीबीआई से स्पष्ट रूप से पूछा है कि इन मामलों में ट्रायल किस चरण में है, सुनवाई आगे बढ़ रही है या नहीं और अब तक क्या प्रगति हुई है। मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में वर्षों तक ट्रायल लंबित रहना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। इससे न केवल पीड़ित पक्ष प्रभावित होता है, बल्कि गवाहों की गवाही भी कमजोर पड़ सकती है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य में MP-MLA के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का शीघ्र निष्पादन सुनिश्चित किया जाए।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वर्तमान में उसके पास MP-MLA से जुड़े केवल दो मामले थे। इनमें से एक मामला पूर्व मंत्री बंधु तिर्की से संबंधित है, जिसे सीबीआई को स्थानांतरित कर दिया गया है। यह मामला वर्ष 2010 के विजिलेंस स्पेशल केस से जुड़ा है। वहीं, बीज घोटाले से संबंधित विशेष विजिलेंस केस में पूर्व विधायक नलिन सोरेन और सत्यानंद भोक्ता के खिलाफ मामला विजिलेंस कोर्ट में लंबित है। इस प्रकरण में सत्यानंद भोक्ता द्वारा दाखिल डिस्चार्ज पिटीशन खारिज हो चुकी है और अब आरोप तय किए जाने की प्रक्रिया शेष है।
चौकीदार बहाली पर राहत भरा फैसला, बीट का निवासी होना अनिवार्य नहीं
इसी क्रम में झारखंड हाईकोर्ट ने चौकीदार बहाली से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि चौकीदार पद पर नियुक्ति के लिए उसी बीट का निवासी होना अनिवार्य शर्त नहीं है। यह फैसला जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने गिरिडीह जिले के पवन कुमार राय की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
मामले के अनुसार, पवन कुमार राय की उम्मीदवारी इस आधार पर रद्द कर दी गई थी कि वह संबंधित बीट क्षेत्र का निवासी नहीं है। राज्य सरकार और गिरिडीह जिला प्रशासन ने भी इसी तर्क को आधार बनाकर नियुक्ति से इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही खंडपीठ द्वारा स्पष्ट निर्णय दिया जा चुका है। अदालत ने दोहराया कि चौकीदार की नियुक्ति जिला स्तरीय प्रक्रिया है और इसमें केवल उसी बीट के निवासी को ही नियुक्त करना आवश्यक नहीं है। नियुक्ति नियमों के अनुसार पास या आसपास के बीट क्षेत्र के योग्य अभ्यर्थियों की भी नियुक्ति की जा सकती है।
कोर्ट ने 13 सितंबर 2025 को पारित विवादित आदेश को रद्द करते हुए मामले को संबंधित अधिकारियों के पास पुनर्विचार के लिए भेज दिया है। साथ ही निर्देश दिया गया है कि अधिकारी खंडपीठ के फैसले के आलोक में चार सप्ताह के भीतर निर्णय लें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पवन कुमार राय अन्य सभी अर्हताओं को पूरा करते हैं, तो उन्हें चौकीदार पद पर नियुक्ति पत्र जारी किया जाए।