झारखंड हाईकोर्ट ने कोयले के कथित अवैध परिवहन से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के मुख्य यानी प्रेडिकेट ऑफेंस में बरी होने मात्र से उसके खिलाफ चल रही मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई अपने आप खत्म नहीं हो जाती। बरी किए जाने का फैसला अंतिम होना जरूरी है।

मामला अमर मंडल से जुड़ा है। उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने PMLA की धाराओं 3 और 4 के तहत ECIR दर्ज की थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि गोड्डा के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 10 फरवरी 2026 को उन्हें कथित अवैध कोयला परिवहन से जुड़े मामले में बरी कर दिया है। इसलिए उनके खिलाफ PMLA की कार्रवाई भी समाप्त की जानी चाहिए।

अपील की संभावना रहने तक बरी होना अंतिम नहीं

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को शेड्यूल्ड ऑफेंस में बरी किया गया है, तो उस आधार पर PMLA की कार्रवाई तभी खत्म हो सकती है, जब बरी होने का फैसला अंतिम रूप से प्रभावी हो जाए। यानी सभी उपलब्ध अपीलीय रास्ते खत्म हो जाएं या अपील दाखिल करने की निर्धारित समय-सीमा बिना किसी चुनौती के समाप्त हो जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस बरी के आदेश को सक्षम अपीलीय अदालत में चुनौती दी जा सकती है, उसे PMLA कार्रवाई से बचने के लिए अंतिम सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

8.94 करोड़ रुपये के बैंक ट्रेल का भी जिक्र

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कथित अवैध कोयला परिवहन तक सीमित था। अदालत ने ₹85 लाख नकद, संपत्ति से जुड़े 134 मूल दस्तावेजों और याचिकाकर्ता के बैंक खाते में जमा कथित ₹8.94 करोड़ के फॉरेंसिक ट्रेल पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया था।

वहीं, जब्त संपत्तियों से संबंधित कार्यवाही PMLA एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी, नई दिल्ली के समक्ष भी चल रही थी और याचिकाकर्ता ने वहां कारण बताओ नोटिस का जवाब दाखिल किया था।

ECIR को लेकर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी

कोर्ट ने ECIR रद्द करने की मांग भी स्वीकार नहीं की। अदालत ने स्पष्ट किया कि ECIR ED का आंतरिक दस्तावेज है और इसे FIR के समान नहीं माना जा सकता। ECIR दर्ज होना जांच की शुरुआत को दर्शाता है।