झारखंड हाई कोर्ट ने ‘झारखंड निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2024’ को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि निजी विश्वविद्यालयों द्वारा अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों पर उठाई गई आपत्तियों और दिए गए सुझावों पर अपना स्पष्ट पक्ष प्रस्तुत करे।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की खंडपीठ के समक्ष निजी विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों और महाधिवक्ता के बीच हुई बैठक की विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई। अदालत ने सरकार से कहा कि बैठक में उठाए गए सभी बिंदुओं और वैकल्पिक प्रस्तावों पर अपना आधिकारिक जवाब दाखिल करे।
याचिकाकर्ता निजी विश्वविद्यालयों का कहना है कि नया अधिनियम उनकी स्वायत्तता को प्रभावित करता है। अधिनियम के तहत विश्वविद्यालयों को 15 दिनों के भीतर एक करोड़ रुपये का लाइसेंस शुल्क जमा करने का प्रावधान किया गया है, जिस पर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई है। इसके अलावा कुलपति की नियुक्ति, संचालकों की शैक्षणिक योग्यता और प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़े प्रावधानों को भी चुनौती दी गई है।
विश्वविद्यालयों का तर्क है कि वे पूरी तरह स्व-वित्तपोषित संस्थान हैं और अपने-अपने स्थापना अधिनियमों के तहत संचालित हो रहे हैं। ऐसे में नया कानून उनके पुराने अधिनियमों को अप्रभावी बनाकर उन पर अतिरिक्त नियम लागू करता है, जो उनकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप के समान है।
मामले की सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि अधिनियम के क्रियान्वयन पर हाई कोर्ट द्वारा पूर्व में लगाई गई अंतरिम रोक फिलहाल जारी रहेगी। जब तक अदालत अंतिम निर्णय नहीं लेती, तब तक अधिनियम के विवादित प्रावधान लागू नहीं किए जा सकेंगे।
इस मामले में याचिका दायर करने वालों में Sarala Birla University, Sainath University, Radha Govind University समेत कई शैक्षणिक संस्थान और ट्रस्ट शामिल हैं।
अब मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह निर्धारित की गई है, जहां राज्य सरकार को अपना आधिकारिक पक्ष अदालत के समक्ष रखना होगा। इस सुनवाई पर राज्य के निजी विश्वविद्यालयों और शिक्षा जगत की नजरें टिकी हुई हैं।

