Site icon Jharkhand LIVE

झारखंड राज्यसभा चुनाव में मुकाबला दिलचस्प, बैजनाथ राम, प्रणव झा और परिमल नाथवाणी ने भरा नामांकन

झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले द्विवार्षिक चुनाव का मुकाबला अब बेहद दिलचस्प हो गया है। नामांकन के अंतिम दिन सोमवार को झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम, कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा और भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी ने अपना नामांकन दाखिल किया।

झामुमो के केंद्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री बैजनाथ राम ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी में दो सेटों में नामांकन पत्र दाखिल किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन स्वयं उनके प्रस्तावक बने। वहीं कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा ने भी इंडिया गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में नामांकन भरा। उनके प्रस्तावकों में विधायक कल्पना सोरेन शामिल रहीं, जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी मौजूद थे।

दूसरी ओर, उद्योगपति और पूर्व राज्यसभा सांसद परिमल नाथवाणी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया। उन्हें भाजपा और एनडीए के विधायकों का समर्थन प्राप्त है। नाथवाणी की एंट्री ने चुनावी मुकाबले को और रोचक बना दिया है।

क्या कहता है विधानसभा का गणित?

झारखंड विधानसभा में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 28 प्रथम वरीयता मतों की जरूरत है। इंडिया गठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं, जिनमें झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा-माले शामिल हैं। यदि गठबंधन पूरी तरह एकजुट रहता है तो दोनों सीटों पर उसकी स्थिति मजबूत मानी जा रही है।

वहीं एनडीए के पास 24 विधायक हैं। ऐसे में भाजपा समर्थित परिमल नाथवाणी की जीत के लिए अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी। यही वजह है कि चुनावी चर्चा अब संभावित क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक रणनीति पर केंद्रित हो गई है।

भाजपा ने क्यों नहीं उतारा अपना उम्मीदवार?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार संख्या बल को देखते हुए भाजपा ने अपना आधिकारिक उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। पार्टी ने निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी को समर्थन देकर चुनाव को रोचक बना दिया है। हालांकि इंडिया गठबंधन के नेताओं ने भाजपा पर हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है और दावा किया है कि उनके सभी विधायक एकजुट हैं।

इस बीच भाजपा नेता गौरव वल्लभ द्वारा नामांकन पत्र खरीदने के बावजूद पर्चा दाखिल नहीं करने को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

अब सभी की निगाहें 18 जून को होने वाले मतदान पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि विधानसभा का गणित राजनीतिक रणनीति पर भारी पड़ता है या फिर चुनाव में कोई बड़ा उलटफेर देखने को मिलता है।

Exit mobile version