दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर मंगलवार को साहिबगंज में उनकी आदमकद प्रतिमा का भव्य अनावरण किया गया। इस मौके पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में हजारों की संख्या में लोगों ने भाग लेकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम में झारखंड सरकार के मंत्री दीपक बिरुवा, पूर्व मंत्री आलमगीर आलम, मुख्यमंत्री के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा सहित कई जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेता व कार्यकर्ता मौजूद रहे। सभी ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन के झारखंड आंदोलन, आदिवासी-मूलवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई और राज्य निर्माण में उनके ऐतिहासिक योगदान को याद करते हुए उन्हें नमन किया।
इस दौरान मंत्री दीपक बिरुवा ने कहा – आज साहेबगंज की इस ऐतिहासिक और पवित्र धरती पर, जो सिदो-कान्हू और चांद-भैरव के महासंग्राम की साक्षी रही है, हम सब एक अत्यंत ऐतिहासिक और भावुक क्षण के साक्षी बनने के लिए एकत्र हुए हैं। आज हमारे बीच, हमारे दिल में बसने वाले, झारखंड आंदोलन के प्रणेता, हम सभी के मार्गदर्शक और दिशोम गुरु आदरणीय शिबू सोरेन जी (गुरुजी) की भव्य प्रतिमा का अनावरण हो रहा है।
साथियों, गुरुजी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि झारखंडियों के मान-सम्मान, स्वाभिमान और अस्तित्व की जीती-जागती मिसाल हैं। जब महाजनों और सूदखोरों ने हमारे आदिवासी-मूलवासी भाइयों की जमीनों को छीनना शुरू किया था, तब एक युवा शिबू सोरेन ने हथियार उठाने और संघर्ष करने का संकल्प लिया था। अपने पिता की निर्मम हत्या का दर्द सहने के बावजूद वे टूटे नहीं, बल्कि उन्होंने तय किया कि जब तक इस माटी से महाजनी प्रथा खत्म नहीं होगी, वे चैन की सांस नहीं लेंगे। गोला, पेटरवार, बोकारो, धनबाद और टुंडी से शुरू हुआ ‘धान काटो अभियान’ पारसनाथ के जंगलों से होता हुआ इसी संथाल परगना की माटी तक पहुंचा। उन्होंने अपनी पूरी जवानी जंगलों और संघर्षों में बिता दी ताकि आज हम और आप सिर उठाकर जी सकें।
आज जब हम साहेबगंज में खड़े हैं, तो मुझे गुरुजी का वह ऐतिहासिक संस्मरण याद आता है। टुंडी में आदिवासियों को एकजुट करने और शिक्षा व खेती सिखाने के बाद जब पुलिस गुरुजी के पीछे पड़ी थी और उन पर इनाम घोषित था, तब गुरुजी ने महसूस किया कि अब ‘संथाल परगना’ को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इसी साहेबगंज और संथाल परगना की माटी पर आकर गुरुजी को साइमन बाबू, हेमलाल बाबू और स्टीफन बाबू जैसे सच्चे और निष्ठावान साथी मिले। गुरुजी बताते थे कि जब वे साहेबगंज और दुमका की गलियों व गांवों में पहुंचते थे, तो न रात की परवाह होती थी, न जंगल-पहाड़ का डर। संथाल परगना के गांव-गांव में जब गुरुजी की एक आवाज गूंजती थी, तो कोल्हान से लेकर साहेबगंज तक लाखों आदिवासी-मूलवासी तीर-धनुष लेकर अपने हक की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतर आते थे। 1980 में इसी संथाल परगना की जनता ने ही गुरुजी को पहली बार दिल्ली की संसद में भेजकर उनकी आवाज को पूरे देश में गूंजने का मौका दिया था।
साथियों, गुरुजी ने हमें हमेशा सिखाया कि यह झारखंड राज्य हमें किसी ने खैरात में नहीं दिया है। इसके लिए विनोद बाबू, निर्मल महतो बाबू जैसे महान नेताओं का मार्गदर्शन रहा और हमारे न जाने कितने वीरों ने अपनी शहादत दी। आज जो विरोधी पूछते हैं कि शिबू सोरेन जी ने क्या किया, उन्हें साहेबगंज की इस पवित्र धरती से जवाब दीजिए— गुरुजी ने अपनी जवानी कुर्बान करके, जेल की यातनाएं सहकर और अपना पूरा जीवन न्योछावर करके हमें यह ‘झारखंड राज्य’ दिया है। हमारा अपना मान-सम्मान दिया है।
“लड़ के लिया है झारखंड, लड़ के बचाएंगे झारखंड!”
आज जब झारखंडी मान-सम्मान के साथ जी रहे हैं, तो एक बार फिर बाहरी और विरोधी ताकतें हमारे हक को छीनने और हमें आपस में लड़ाने की साजिश कर रही हैं। गुरुजी के बाद अब उनके विचारों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी आदरणीय हेमंत सोरेन जी पर है। जिस तरह गुरुजी को दबाने और कुचलने के लिए जेल भेजा गया था, ठीक उसी तरह आज हेमंत बाबू को भी प्रताड़ित किया जा रहा है क्योंकि वे गुरुजी के नक्शे-कदम पर चलकर आदिवासियों, मूलवासियों, माताओं-बहनों और युवाओं के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन वे गुरुजी के बेटे हैं, वे झुकने वाले नहीं हैं।
आज इस प्रतिमा अनावरण के शुभ अवसर पर, हम साहेबगंज की इस पावन माटी को साक्षी मानकर यह संकल्प लेते हैं कि दिशोम गुरुजी के दिखाए संघर्ष के रास्ते पर हम सब एकजुट रहेंगे। हेमंत बाबू के हाथों को मजबूत करेंगे और झारखंड के मान-सम्मान पर कभी आंच नहीं आने देंगे।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन — अमर रहें! अमर रहें!
जय झारखंड!

