झारखंड कैडर के IAS रमेश घोलप की मां आज भी बेचती हैं चूड़ियाँ, पढ़िए संघर्ष की कहानी

झारखंड कैडर के IAS रमेश घोलप की मां आज भी बेचती हैं चूड़ियाँ, पढ़िए संघर्ष की कहानी

रमेश घोलप कोडरमा के डीसी थे, रविवार की शाम हेमंत सरकार ने उनका तबादला झारखंड राज्य कृषि विपणन परिषद के निदेशक पद पर कर दिया है। रमेश घोलप की आईएएस अधिकारी बनने की कहानी हम सबके लिए प्ररेणादायक है। रमेश घोलप का जन्म महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के वारसी तहसील स्थित महागांव में हुआ था। रमेश घोलप वो शख्स हैं जो गरीबी की आँच से तपकर निकले और आज एक आईएएस अफसर हैं।

रमेश घोलप ने बचपन में ही जीवन की विपरित धाराओं में बहना सीख लिया था। माँ घर चलाने के लिए गाँव में घूमघूमकर चूड़ियाँ बेचा करती थी। रमेश भी 10 साल की छोटी से उम्र में ही माँ की मदद के लिए उनके साथ चूड़ियाँ बेचने के लिए जाते थे। दोनों चूड़ियाँ बेचकर कुछ तो पैसा इकट्ठा कर लेते थे, लेकिन वे पैसे घर के राशन की जगह नशे की लत के शिकार पिता की शराब में खर्च हो जाते थे।

दिन भर की मेहनत के बाद भी माँ और बेटे की पेट की आग बूझ नहीं पाती थी। इन कष्टदायक हालातों में भी रमेश के हौसले कभी कम नहीं हुए। उन्होंने इन परिस्थितियों से परेशान होने की बजाय इसे ही अपनी मजबूती बना लिया।

बोर्ड परीक्षा से एक माह पूर्व ही रमेश घोलप के पिता का निधन हो गया, लेकिन उन्होंने अपनी भावनाओं को समेट कर परीक्षा के लिए लगन से मेहनत की और 88।50 पर्सेंट नंबर हासिल किए। इसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए पुणे चले गए, लेकिन उनके लिए आगे की राह आसान नहीं थी। पढ़ाई के लिए रूपयों का इंतजाम करना उनके लिए दाँतों तले लोहा चबाने जैसे था।

माँ ने अपने प्रतिभावान बेटे की पढ़ाई के लिए जैसे तैसे किसी सरकारी योजना के अंतर्गत कर्ज लिये और 18 हजार रूपये का जुगाड़ किया। पुणे में रमेश भी आईएएस बनने का इरादा मन में बांध चुके थे। दिन में सड़कों पर पर्चे बाँटने, दीवारों पर पेंटिंग करने का काम कर पैसे जुटाते और रात के वक्त पढ़ाई किया करते थे।

इनती मेहनत के बाद जब वह पहले बार यूपीएसपी की परीक्षा में शामिल हुए तो उन्हें परीक्षा में विफलता हाथ लगी, लेकिन वो हार नहीं माने। इसके बाद वह एक बार फिर से साल 2011 में लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शामिल हुए और इस बार उन्होंने अपने लक्ष्य पर विजय पा लिया। उन्हें देशभर में 287वें स्थान प्राप्त किया किया।

रमेश घोलप बताते हैं कि उनकी मां आज भी चूड़ीयां बेचा करती है। उन्होंने बताया कि मां कहती है कि यहीं चूड़ियाँ बेचकर मिले पैसों से तुझे पढ़ाकर कलेक्टर बनवाया है। जबतक हाथ चलेंगे चूड़ियाँ बेचती रहूंगी।’ विपरित हालात में जो साथ देते है उनको कभी नहीं भूलना चाहिए

रमेश घोलप अपनी मां के संघर्षों को आज भी याद करते हैं। कुछ माह पहले उन्होंने पोस्ट के जरीए बताया था कि “संघर्ष के दिनों में जब सर पर छत नहीं था, तब हम लोगों का नाम भी बीपीएल में दर्ज करकर हमको एक ‘इंदिरा आवास’ का घर दे दीजिए इस फ़रियाद को लेकर जिस महिला ने कई बार गाँव के मुखिया और हल्का कर्मचारी के ऑफिस के चक्कर काटे थे, उस महिला को अब अपने बेटे के हस्ताक्षर से जिले के आवासहीन ग़रीब लोगों को घर मिलता है यह समझने पर उसके मन में क्या विचार आ रहें होंगे?, पति की मृत्यू के बाद विधवा पेंशन स्वीकृत कराने के नाम से एक साल से ज़्यादा समय तक गाँव की एक सरकारी महिला कर्मी जिससे पैसे लेती रही थी, उस महिला के मन में आज अपना बेटा कैम्प लगाकर विधवा महिलाओं को तत्काल पेंशन स्वीकृत कराने का प्रयास करता है यह पता चलने पर क्या विचार आये होंगे?’

कोडरमा डीसी पद से हटाए जाने के बाद रमेश घोलप ने कहा कोडरमा डीसी के पद से तबादला हो गया। पोस्टिंग के दौरान पद और जनता को न्याय देने का प्रयास रहा।सहयोग के लिए आमजनों,जनप्रतिनिधि,वरीय पदाधिकारी,जिले के अधिकारी,कर्मी,प्रेस के साथियों का आभार।पिछले दो साल बेहतरीन समय था।कठिन समय में लोगों की सेवा का मौका देने के लिए सरकार को धन्यवाद

Jharkhand LIVE Staff

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