झारखंड के कोडरमा जिले के झुमरी तिलैया का प्रसिद्ध केसरिया कलाकंद अब वैश्विक पहचान हासिल कर चुका है। इस पारंपरिक मिठाई को आधिकारिक तौर पर भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। इसके साथ ही यह झारखंड की पहली मिठाई और पहला खाद्य उत्पाद बन गया है, जिसे यह प्रतिष्ठित पहचान मिली है।
केसरिया कलाकंद की कहानी देश के विभाजन से जुड़ी हुई है। विभाजन के बाद पाकिस्तान के रावलपिंडी से विस्थापित होकर आए हंसराज भाटिया और मूलकराज भाटिया ने झुमरी तिलैया में ‘भाटिया मिष्ठान’ की स्थापना की थी। वर्ष 1960-62 के दौरान उन्होंने विशेष मलाईदार कलाकंद बनाना शुरू किया, जो धीरे-धीरे अपनी अनूठी गुणवत्ता और स्वाद के कारण लोगों की पहली पसंद बन गया।
बताया जाता है कि शुरुआती दौर में यह कलाकंद मात्र चार रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता था। बाद में इसमें असली केसर और गुलाब जल का इस्तेमाल शुरू किया गया, जिससे इसका स्वाद और पहचान दोनों अलग हो गए। इसी कारण इसे “केसरिया कलाकंद” नाम मिला।
स्थानीय मिठाई कारोबारियों के अनुसार, इस कलाकंद की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक दानेदार बनावट और शुद्ध दूध से तैयार होने वाली गुणवत्ता है। एक किलो केसरिया कलाकंद बनाने में करीब चार लीटर दूध का उपयोग किया जाता है। माना जाता है कि कोडरमा के पानी और जलवायु का भी इसके स्वाद में महत्वपूर्ण योगदान है।
जीआई टैग मिलने से अब केसरिया कलाकंद को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान मिलेगी। साथ ही इस नाम का व्यावसायिक दुरुपयोग रोकने में भी मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्थानीय डेयरी उद्योग, मिठाई व्यवसाय और रोजगार के नए अवसरों को बढ़ावा मिलेगा।
हाल ही में झारखंड के 11 पारंपरिक उत्पादों को जीआई टैग मिला है, जिनमें केसरिया कलाकंद भी शामिल है। इस उपलब्धि को कोडरमा और पूरे झारखंड के लिए गौरवपूर्ण माना जा रहा है।

